भाजपा के लिए शुभ साबित हुए हैं हरीश रावत/Harish Rawat has proven to be auspicious for the BJP

हरीश रावत

-हरदा के मुख्यमंत्री बनने के बाद लगातार बढ़ती गई सत्ताधारी दल की सियासी ताकत

देहरादून, संजय झा: हरीश रावत की सियासी सक्रियता भाजपा के लिए हमेशा शुभ रही है। ऐन चुनाव के वक्त पूर्व सीएम ऐसा कोई बयान जारी करते हैं या अपने रसूख का इस्तेमाल कर कुछ ऐसा कर जाते हैं जो भाजपा को न केवल चुनावी जंग में जूझने का अवसर देता है बल्कि जीत भी सुनिश्चित करता है। यही वजह है कि भाजपा हमेशा हरीश रावत को केंद्र में रखकर ही चुनाव लड़ना चाहती है।

हरदा के सात भाजपा के इस समीकरण की शुरुआत वर्ष 2016 में उस समय हुई जब वह मुख्यमंत्री थे। पार्टी के एक दर्जन से अधिक विधायकों ने उनकी कार्यशैली से नाराज होकर इस्तीफा दे दिया और भाजपा का दामन थाम लिया। पूर्व सीएम विजय बहुगुणा, सुबोध उनियाल, हरक सिंह रावत, यशपाल आर्य, रेखा आर्य, सतपाल महाराज, उमेश शर्मा काऊ आदि ऐसे सियासी दिग्गज हैं जो पहले कांग्रेस में हुआ करते थे आज बीजेपी को ताकतवर बनाए हुए हैं। पांच साल की भाजपा यात्रा के बाद हरक और यशपाल आर्य ने तो घर वापसी कर ली पर बाकी अभी भी भाजपा में हैं। कांग्रेस की टूट के बीच हरीश रावत का एक स्टिंग भी सामने आया जिसने भाजपा के लिए संजीवनी का काम किया और वर्ष 2017 के विधानसभा चुनाव में उसे जबरदस्त जीत दिलायी। वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव में हरीश रावत की पुरानी कार्यशैली को देखते हुए शीर्ष नेतृत्व ने उन्हें चुनावी प्रक्रिया से दूर रखा। लेकिन ऐन वक्त पर वह अपने रसूख का इस्तेमाल कर चुनाव प्रचार समिति का मुखिया बनने में सफल रहे। इस हैसियत से उन्होंने कई सीटों पर प्रत्याशियों में बदलाव किया और इसी कारण कम से कम आधा दर्जन से अधिक सीटों पर कांग्रेस की हार हुई । हरीश रावत यहीं पर नहीं रुके। उन्होंने सरकार बनने पर मुस्लिम यूनिवर्सिटी की स्थापना का ऐलान भी कर दिया। मोदी युग में वोटों के धार्मिक आधार पर हुए ध्रुवीकरण के बीच हरीश रावत की इस घोषणा को भाजपा ने हाथों हाथ लिया और हिंदू वोटरों को अपनी ओर खींचने में सफल रही। इससे पहले बतौर मुख्यमंत्री नमाज पढ़ने के लिए अवकाश देने की उनकी घोषणा भी कांग्रेस के खिलाफ गई थी। कुल मिलाकर पिछले दो चुनाव में भाजपा की जबरदस्त जीत की एक प्रमुख वजह हरीश रावत ही रहे हैं। ऐसे में भाजपा लगातार चाहती रही है कि हरीश रावत ही कांग्रेस की कमान संभालें। लेकिन कांग्रेस भी इस हकीकत को जानती है। इस कारण वर्ष 2027 के चुनावी समर से हरीश रावत को दूर ही रखा गया है। हरीश रावत भी कोपभवन में हैं। लेकिन उनके पूर्व ओएसडी चंदन सिंह जीना के घर छापेमारी के बाद हरीश रावत फिर से सियासी केंद्र में आ चुके हैं। यानी भाजपा जो चाहती थी वह फिर हो गया।

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