संजय झा, वरिष्ठ पत्रकार

मैं एक सामान्य मध्यमवर्गीय किसान परिवार से ताल्लुक रखता हूं। 90 के शुरुआती वर्षों में दरभंगा से ग्रेजुएशन (कला संकाय) किया। मार्क्स बहुत अच्छा नहीं था। फिर भी पिता जी को लगा कि मुझे आईएएस की तैयारी करनी चाहिए। मेरे बड़े भाई उस समय नोएडा में निजी फर्म में नौकरी करते थे। उन्होंने सहयोग किया और अपने साथ नोएडा ले आए। यहां कुछ दिन रहने के बाद उन्होंने दिल्ली भेज दिया। उनका मानना था कि नोएडा में रहकर तैयार नहीं हो सकती। मैं तिमारपुर क्षेत्र में नेहरू विहार में आकर किराये के कमरे में रहने लगा। सिविल सर्विसेज की तैयारी शुरू की। कुछ ही दिन बाद बिहार लोक सेवा आयोग की पीसीएस की वैकेंसी निकली। आधी अधूरी तैयारी के बावजूद मैंने फार्म भर दिया। उम्मीद तो नहीं थी परंतु प्रारंभिक परीक्षा में मेरा चयन हो गया। उसके बाद मुख्य परीक्षा में बेहतर परफारमेंस नहीं रहा और फेल हो गया। इस बीच यूपीएससी द्वारा आयोजित सिविल सर्विसेज परीक्षा भी शामिल होना शुरू कर दिया। उस समय सामान्य उम्मीदवार 28 वर्ष की आयु तक चार अटेम्प्ट दे सकते थे। मैने चारो अटेंप्ट दिये और हर बार प्रारंभिक परीक्षा पास करता गया। आगे की परीक्षा में असफल होता गया। इस दौरान मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, बिहार और राजस्थान की प्रांतीय सिविल सेवा की परीक्षा भी दी, आठ या नौ बार प्रारंभिक परीक्षा में सफल हुआ और हर बार आगे की परीक्षा में फेल होता गया। कुल मिलाकर उम्र 30 तक पहुंच गयी और हाथ में कुछ भी आया। जिद थी की सिविल सर्विसेज में ही जाउंगा। इस कारण ऑब्जेक्टिव प्रतियोगी परीक्षाओं में भाग ही नहीं लिया। इस तरह न ‘खुदा मिला न विसाले सनम’ वाली कहानी का पात्र बनकर रह गया। लगभग सात वर्षों तक परिवार का पैसा खराब करता रहा और नाकामी पर नाकामी हासिल करता रहा। न तो पिता जी ने और न हीं बड़े भाई ने कभी पूछा कि इतना पैसा खर्च कर रहे हो, कुछ हासिल क्यों नहीं कर पा रहे हो? वे हमेशा संघर्ष करने के लिए प्रेरित करते रहे। लेकिन मुझे खुद खराब लगने लगा और किसी भी प्रकार की सम्मानजनक नौकरी की तलाश में जुट गया। मेरे गांव के ही मित्र श्यामानंद के जीजा जी उस समय एक प्रमुख हिंदी अखबार में मेरठ में कार्यरत थे। उनकी मदद से मेरठ पहुंचा और उसी अखबार में बतौर ट्रेनी सब एडीटर काम मिल गया। कोई और विकल्प नहीं था, इस कारण मीडिया को ही करियर बना लिया। नौकरी शुरू करने से पहले इस लाइन में जाने के बारे में कभी सोचा नहीं था। खैर.. नौकरी करने लगा। अपने काम के दम पर आगे बढ़ता गया। आज मैं अपने काम से संतुष्ट हूं।
तैयारी करने में लाखों रुपये खर्च करने का हासिल क्या हुआ..?
यही सबसे बड़ा सवाल है और इसका जवाब सभी को जानना चाहिए। …मीडिया लाइन में जब आया, तब से लेकर आज तक जो भी व्यक्ति मिला जिससे भी बात की, कभी इस आत्महीनता में नहीं रहा कि सामने वाला व्यक्ति मुझसे अधिक जानता है। हां, कोई विषय विशेषज्ञ हो सकता है। अपने फन का माहिर हो सकता है लेकिन ऐसा नहीं लगा कि मैं उस व्यक्ति से समग्र रूप में थोड़ा सा भी कम जानता हूं। यानि सिविल सर्विसेज की तैयारी में जो भी अध्ययन किया या जो भी ज्ञान हासिल किया उसका सार्थक परिणाम आज भी मिल रहा है। मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि मेरी पढ़ाई व्यर्थ नहीं गई। पत्रकारिता की फॉर्मल डिग्री के नहीं होने के बावजूद यदि इस लाइन में टिका हूं और सामने वाले की आंख में आंख डालकर बात करने का साहस रखता हूं तो सिर्फ सिविल सर्विसेज की तैयारी के दौरान की गई पढ़ाई के दम पर। यह अलग बात है कि इस पेशे में उम्र और तजुर्बे वाले कई ऐसे लोग मिले जिनका मैं सम्मान करता हूं और हमेशा सम्मान करता रहूंगा। फिर बात को वहीं ले चलता हूं..। सिविल सर्विसेज नहीं कर सका, इसका अफसोस तो है, पर कभी भी कोई गलत कदम उठाने का ख्याल या परिवार वालों के सामने मुंह दिखाने कैसे दिखाऊंगा जैसा विचार मन में नहीं आया। परिवार के प्रति जवाबदेही जरूर थी और उन्होंने कहा कि नहीं हुआ तो कोई बात नहीं. कुछ और कर लो। और मैंने कुछ और कर भी लिया।
आज के बच्चे ध्यान दें..
मैं अपनी तुलना आज के अभ्यर्थियों से करता हूं। नीट आदि की तैयारी कर रहे छात्रों से मेरा अनुरोध यही है कि वे मेहनत करें। पूरी ईमानदारी से करें। यदि सफलता मिलती है तो ठीक है, नहीं मिलती है तो करियर का कुछ और विकल्प चुनें। आत्महत्या करने जैसे ख्याल तो अपने दिमाग में कतई नहीं आने दें। मां-बाप से भी विनम्र अनुरोध है कि वे अपने बच्चों को प्रतिस्पर्धा के उस नाजुक मोड़ पर ना पहुंचा दें कि नाकामी की सूरत में वह बुरे खयाल दिल में लाएं और आत्महत्या जैसा कठोर कदम उठा लें। एक परीक्षा फेल करने से सब कुछ खत्म नहीं हो जाता। आपके बस में जितना है उतना ही करें।
बात मेरी बेटी की….
यहां पर मैं अपनी बेटी की कहानी शेयर करना चाहूंगा। अभी इसी साल उसने 12वीं (कला संकाय) कक्षा की परीक्षा सीबीएसई बोर्ड से 93 प्रतिशत अंकों के साथ पास की है। रिजल्ट के दिन घर में सभी लोग बहुत खुश थे। बेटी को उम्मीद थी कि इतनी बड़ी कामयाबी मिलने के बाद मैं उसके लिए कोई सरप्राइज प्लान करूंगा। लेकिन मेरा रिस्पांस सामान्य रहा। अंत में बेटी ने पूछ ही दिया कि पापा मैं 93 प्रतिशत अंकों से पास हुई हूं, आपको खुशी नहीं हुई। मैंने कहा कि बेटा 10वीं की परीक्षा में जब तुम्हारा परफॉर्मेंस बहुत अच्छा नहीं हुआ था तो भी मैं दुखी नहीं हुआ था। आगे भी यदि परफॉर्मेंस खराब होता है तो मुझे कोई दुख नहीं होगा। मुझे पता है कि तुम अपनी पढ़ाई लगन और मेहनत से कर रही हो। यही मेरे लिए मायने रखता है। सफलता मिली तो भी ठीक है और असफलता मिली तो भी कोई बात नहीं। उसने ग्रेजुएशन कोर्स के लिए सीयूईटी (यूजी) की परीक्षा दी। उसे कामयाबी नहीं मिली। एक तरह से सीयूईटी में फेल हो गयी। मेरी वाइफ ने पूछा अब क्या होगा? मैंने और मेरी बेटी ने एक साथ जवाब दिया, कहीं न कहीं तो एडमिशन हो ही जाएगा..। चिंता क्यों..?
मेरा कहना यह है कि अब या पहले, प्रतियोगी परीक्षाओं का मकसद ही रिजेक्शन होता है। यानी इट्स जस्ट ए रिजेक्शन प्रोसेस। जब प्रोसेस ही रिजेक्शन का है तो चिंता क्यों..? बंदे में यदि दम है तो कुछ न कुछ तो कर ही लेगा।
किसी ने सच कहा है
Rejection is a normal part of any application journey, not a sign of your personal worth. It helps you build strength, learn new things, and get closer to a final “yes”